Friday, December 18, 2015

खोजने हैं पुराने वो कुछ सपने

खोजने हैं पुराने वो सपने
जो कभी छोटे-छोटे होथों ने
बड़ी-बड़ी आंखों से देखे थे
अपनी जान से भी बड़ी कल्पना की थी...

वो खो गए है अभी कहीं उसके साथ
कुछ विश्वास जो कभी होते थे अपने पास
ना जाने क्यों कर रहा है वह मुझसे विश्वासघात
खोजने हैं पुराने वो कुछ सपने...

जिसमें बसते थे विश्वास अपने
अब उन विश्वासों को खोज रहा हूं
खुद को छोड़ सपनों को जोड़ रहा हूं
मुझे उस सपनों को पाना है...

जो कभी देखे थे छोटे-छोटे हाथों ने
बड़े-बड़े आंखों ने उन सपनों को पाना है
फिर से वहीं विश्वीस अपने अंदर जगाना है...

Thursday, December 17, 2015

जिंदगी ना जाने तू मुझसे

जिंदगी ना जाने तू मुझसे क्या चाहते हो
किस मोड पर लाकर मु़झे छोड़ देते हो
मेरे ख्वाबों, मेरी तम्मनोओं को कहीं
पीछे छोड़ ना जाने किस ओर चले जा रहे हो...

मेरे हर कोशिश को नाकाम किए जा रहे हो
मुझसे ना जाने कौन सी दुश्मनी है
जिसे तुम हर पल निभाए जा रहे हो
मुझे अंधेरों में धकेल के किसी ओर के हुए जा रहे हो...


जिंदगी ना जाने तुम मुझसे क्या चाहते हो
पर मैं खुद को तेरे ही धारा में छोड़ कर
बिना कुछ सोचे समझे बड़े जा रहा हूं
तेरे रंग में ही रंगे जा रहा हूं...

पर तुम दुश्मनी निभाए जा रहे हो
मेरे हर कोशिश को धुंए में उड़ाए जा रहे हो
पर मैं एक दिन इस धुंए को मोड़ लाउंगा
तेरे दुश्मनी से कही आगें निकल जाउंगा
तब तुम पश्चताओंगे और दुश्मनी
छोड़ दोस्ती का हाथ बढ़ओंगें...
                                                                                                                                                             


Thursday, November 26, 2015

वक्त हमें कई बार

वक्त हमें कई बार अंधेरे में लाकर छोड़ देती है
दर्द में बेबस बेहाल कर देती है
तब ना मैं नजर आता हूं और ना कोई रास्ता नजर आजा है
दूर-दूर तक बस अंधेरा नजर आता है...

इस अंधेरे में तड़पता हूं, रोता हूं
चिख्ता हूं चिल्लाता हूं, गिड़गिड़ाता हूं
फिर लाचार सा गिर जाता हूं...

सोचता हूं कोई तो आएगा मरहम लगाने को
पर इस शहर में बिना मरहम दिल तोड देती है
वक्त कई बार यू ही अंधेरे में ला कर छोड़ देती है...

कई अपने पराए की समझ तब आती है
सोचता हूं इस शहर में क्या पाया मैंने
फरेब, धोखा, जालसाजी के अलावे...

रोज भीड़-भाड़ में चश्मा पोछ-पोछ कर देखता हूं
इस शहर में चौक-चौराहे पर अपने जैसा खोजता हूं
मुझे पता है मैं उसे नहीं डूंड पाउंगा फिर भी
बेबस सा उसके पीछे भागता हूं...

वक्त हमें कई बार अंधेरे में लाकर छोड़ देती है
जिंदगी यू ही कहीं रेत की तरह फिसल जाती है...

Friday, November 20, 2015

वक्त कितना कुछ सिखा देता है

वक्त कितना कुछ सिखा देता है
एक मासूम को जवां बना देता है
खेलना कुदना छोड़ कर कामों में फसा देता है
वक्त कितना कुछ सिखा देता है...

जिंदगी को नया बना देता है
दुनिया की हकीकत से रू-ब-रू करा देता है
सब कुछ झोड़ किसी और में रमा देता है
वक्त हमें कितना कुछ सिखा देता है...

अजीब कश्मकस है जिंदगी में यारो
कुछ पाने की चाह में जिंदगी बिता देते है
वक्त एक पल में उसे मीटा देता है
इस वक्त के आगे सब लाचार है...

दुनिया में सब इसके आगे बेकार है
अब सोचता हूं क्या मिला जिंदगी में
धोखा-ठोकर के अलावे, शायद यही वक्त
की मार है इसके आगे सब लाचार है
वक्त कितना कुछ सिखा देता है...


Tuesday, November 17, 2015

कुछ सपने है जिनकी दास्ता अभी अधूरी है

कुछ सपने है, जिनकी दास्ता अभी अधूरी है
मंजिलों से बस कुछ कदमों की दूरी है
कमद तो थकते नहीं पर फासला बढ़ गए है
वक्त की मिट्टी तले हौसले गढ़ रहे है

छोटे से ही थे पर अब दिनों-दिन और भी सिकुड रहे है
जिन सपनों को लेकर उड़ना चाहते थे, आज वह फुदक रहे है
कुछ सपने है जिनकी दास्ता अभी अधूरी है
मंजिलों से बस कुछ कदमों की दूरी है

उन कदमों को नापने रोज घर से निकल जाता हूं
शाम को फिर खाली हाथ घर को वापस आता हूं
सपनों को पाने की चाह में फिर खो जाता हूं
सुबह फिर नई ताजगी के साथ सपनों के पिछे लग जाता हूं

लेकिन अब लगने लगा है
सपने मेरे कहीं बिखरने लगे है
जैसे-जैसे समय़ बीतता जा रहा है
मेरे सपने खुद ही सिकुडते जा रहा है

मेरे अंदर एक चुभन सी होने लगी है
सपने बिखर कर कहीं खोने लगी है
लेकिन मुझे उन सपनों को पाना है
जिनकी दास्ता अभी लिखे जानी है

Monday, October 19, 2015

सोचता हूं इस बदलाव में अपने को

वक्त के साथ-साथ इनसान बदल रहे है...
रिश्तों के गहराई में इमान बदल रहे है...
जिस रिश्ते को लेकर इनसान जिंदगी भर चलता था...
आज उन्ही रिश्तों के मुकाम बदल रहे...

सोचता हूं इस बदलाव में अपने को कहां तक डाल पाउंगा...
या यू ही जिंदगी के रिश्तों में उलझ कर रह जाऊंगा...
इस रिश्ते की कश्मकस को रोज समझना चाहता हूं...
वक्त और हालात के साथ खुद से समझौता कर रहा हूं

जिंदगी को फिर से नया बना रहा हूं...
रोज जीने का नया ढंग अपने को सिखा रहा हूं...
शायद इस दौर की यही परिभाषा है...
रिश्तों को निभाने के लिए करना अपने से कई समझौता है......

Monday, October 5, 2015

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार अब
पथ यही है वक्त वे वक्त जो याद
आए वो लत यही है...

सोचता था इस लत से आगे निकल जाउंगा
दुनियां में अपना परचम लहराउंगा
पर वक्त के साथ साथ हालात बदलते गए...
जो पाना था उसे छोड़ किसी और में रमते गए...

अब अक्सर सोचता हूं चश्में पोछ-पोछ
कर नीहारता हूं क्या करने निकला था
क्या कर रहा हूं जिंदगी में धिरे-धिरे फिर
उसे स्वीकार रहा हूं, जिससे मैं भागता था
पर आज उसे गले लगा रहा हूं..

Wednesday, July 22, 2015

सोचता था कुछ ऐसा कर जाऊंगा

सोचता था एक दिन कुछ ऐसा कर जाऊंगा
दुनियां में अपना परचम लहराऊंगा।
इसी ख्याल में जीता रहा जिंदगी का 
जहर पीता रहा ।

पर अब ऐसा लगता है गलत फहमी जीता रहा 
क्यों घूट-घूट कर जहर पीता रहा ।
क्यों जिंंदगी को लुटाता रहा। 
बचपन से सुना आ रहा था ..

कुछपाने के लिए कुछ खोना पड़ता है
जिंदगी में जहर भी पीना पड़ता है...
पर अब समझ में आया है...
ये दुनिया बड़ा जालिम है ...
लूट के खाने का यहां सबके पास तालिम है...

Sunday, July 19, 2015

आज कल जिंदगी यू ही गुजरती जा रही है

आज कल जिंदगी यू ही गुजरती जा रही है। 
वक्त रेत की तरह फिसलते जा रही है।
रोज सोचता हूं कुछ तो करना है पर समय ..
यू की निकलते जा रही है ।

किसी की चाह में इतना खो जाता  हूं।
आगे और पिछे का सब भूलता जाता हूं ।
जब अपने ख्वाबों से निकलता हूं,
तो खुद को अकेला तन्हा ही पाता हूं।

निकल जाता हूं बिना किसी मंजील के,
वक्त की धारा के साथ बहते हुए...
बहुत आगे निकल कर भी बहुत कुछ
पीछे रह जाता है.. 

वक्त के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है...
कुछ पाने चाह जिंदगी हमें कहां से कहां ले जाता है...
बहुत कुछ पाने के बाद भी हम खुद को तन्हाई में पाते है...

Thursday, July 16, 2015

हम भी अपने गांव में हुआ करते थे

हम भी अपने गांव में हुआ करते थे बहुत बदमास
चोरी कर के खाया करते थे खट्टे मीठे आम..
गांव की  गलीयों के हम होते थे सरदार...
बरगद के पेढ़ पर बैठ कर कतरे थे यारो से मुलाकात..
  
जिंदगी के सफर में ये सारी चीजे कहीं छुटती गई
वक्त हमसे कहीं आगे निकलती गई...
उस वक्त में फिर से जाने को जी चाहता है..
जिंदगी के उस पल को पाने को जी चाहता है..

जिंदगी में बहुत कुछ करने की चाह हमें कहां ले जाती है..
आगे और पिछे का बहुत कुछ हमसे छीन जाती है...
वक्त के साथ-साथ हम निकलते चले जाते है...
बहुत कुछ पाने के बाद भी तन्हाई में खुद को अकेले ही पाते है...

वक्त वे वक्त

वक्त वे वक्त याद आने लगी हो
हमें बस यू ही तडपाने लगी हो 
कुछ तो बात है तुम में जो 
यू ही दिल को भाने लगी हो ।

सोचता था वक्त के साथ-साथ तुम को भूल जाऊगा ।
वक्त से आगे खुद को निकाल ले जाऊंगा।
जिंदगी को फिर से नया बनाऊगा।
तुम्हें कही भूल कर खुद में खो जाऊंगा।

पर वक्त वे वक्त तुम याद आने लगी हो 
दिल में नासूर बन कर चुभने लगी हो 
वक्त दर वक्त दर्द उभरने लगा है।
जिंदगी यू ही कही रेत की तरह बिखरने लगा है।