वक्त हमें कई बार अंधेरे में लाकर छोड़ देती है
दर्द में बेबस बेहाल कर देती है
तब ना मैं नजर आता हूं और ना कोई रास्ता नजर आजा है
दूर-दूर तक बस अंधेरा नजर आता है...
इस अंधेरे में तड़पता हूं, रोता हूं
चिख्ता हूं चिल्लाता हूं, गिड़गिड़ाता हूं
फिर लाचार सा गिर जाता हूं...
सोचता हूं कोई तो आएगा मरहम लगाने को
पर इस शहर में बिना मरहम दिल तोड देती है
वक्त कई बार यू ही अंधेरे में ला कर छोड़ देती है...
कई अपने पराए की समझ तब आती है
सोचता हूं इस शहर में क्या पाया मैंने
फरेब, धोखा, जालसाजी के अलावे...
रोज भीड़-भाड़ में चश्मा पोछ-पोछ कर देखता हूं
इस शहर में चौक-चौराहे पर अपने जैसा खोजता हूं
मुझे पता है मैं उसे नहीं डूंड पाउंगा फिर भी
बेबस सा उसके पीछे भागता हूं...
वक्त हमें कई बार अंधेरे में लाकर छोड़ देती है
जिंदगी यू ही कहीं रेत की तरह फिसल जाती है...
दर्द में बेबस बेहाल कर देती है
तब ना मैं नजर आता हूं और ना कोई रास्ता नजर आजा है
दूर-दूर तक बस अंधेरा नजर आता है...
इस अंधेरे में तड़पता हूं, रोता हूं
चिख्ता हूं चिल्लाता हूं, गिड़गिड़ाता हूं
फिर लाचार सा गिर जाता हूं...
सोचता हूं कोई तो आएगा मरहम लगाने को
पर इस शहर में बिना मरहम दिल तोड देती है
वक्त कई बार यू ही अंधेरे में ला कर छोड़ देती है...
कई अपने पराए की समझ तब आती है
सोचता हूं इस शहर में क्या पाया मैंने
फरेब, धोखा, जालसाजी के अलावे...
रोज भीड़-भाड़ में चश्मा पोछ-पोछ कर देखता हूं
इस शहर में चौक-चौराहे पर अपने जैसा खोजता हूं
मुझे पता है मैं उसे नहीं डूंड पाउंगा फिर भी
बेबस सा उसके पीछे भागता हूं...
वक्त हमें कई बार अंधेरे में लाकर छोड़ देती है
जिंदगी यू ही कहीं रेत की तरह फिसल जाती है...
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