Tuesday, September 18, 2018

बचपना तो जिंदा रखो



बचपन के जो ख्वाब थे,
वो अब जा कर बता रहा हूं...
कभी चाहत चांद का था,
कभी ख्वाब आसमान का था...
पर अब जिन्दगी में तू नहीं है,
और ना ही अब तुम्हारी चाहत है...

चुप रहता हूं अब पत्थर सा,
दिल पर यही असर हुआ है...
बचपन के जो ख्वाब थे,
वो अब कही बिखर गये है...
खो गया कही वजूद अपना,
दो जून की रोटी में...
अब आंखे बंद होते ही,
सपने अक्सर मुझसे पुछते है...
कहां है तमन्ना तुम्हारी,
कहां तुम्हारी चाहत है...
दो जून की रोटी बस,
यही तुम्हारी हालत है...
जमानें मे आये हो तो,
जीने का हुनर भी सिखो...
अब चाहत भले ही ना रखो,
आसमान, चांद का...
पर बचपना तो जिंदा रखो।

Monday, September 3, 2018

सांस का क्या सांस तो मजबूरन आनी जानी है...



जिंदगी अब बहुत बीरानी है, सांस तो मजबूरन आनी-जानी है...
अगर तब आंस भी गिरते तो वो मोती थे...
अब दरिया भी बहा दूं तो सब पानी है...
मुझे अपना बनाकर, रहबरी का भरम रख देते...
भले तुम उसपे मरते, कहीं मुझको भी रख देते...
मैं भी अपने शबाब पर हूं, मुझमें भी जवानी है...
बताओ अब कहां जाऊं मैं, मुझे कैसे बितानी है... 
चाहकर भी मर नहीं सकती, बस जिंदगी गंवानी है...
तुम अगर भरम भी रख देते, तो बात कुछ और होती...
चीखकर अब दरिया भी बहा दूं, तो सिर्फ पानी है...
जिंदगी अब बहुत बीरानी है, सांस तो मजबूरन आनी-जानी है...
जिन्दगी भर की तपस्या का उदय तुम थे...
मन्नते, भूख प्यास, आश, खुदा तुम थे...
अब कौन समझेगा, तब जमाने से खफा हम थे...
दुश्मनी मां-बाप से करने की वजह तुम थे...
ये तो सच है कि तुम मुझपे तब मरते थे...
पा के मुझे लम्हों में कायनाथ से न डरते थे...
क्या हुआ तुमको की मेरा असर कम होने लगा...
मेरी दुआओं में जहन्नुम का बसर होने लगा...
अब तो इस बसर में जिहालत की रवानी है...
सांस का क्या सांस तो मजबूरन आनी जानी है...

मधुमास


मधुमास हो गया लाश प्रिये..
कितना नीरस मधुमास प्रिये..
कितना नीरस मधुमास प्रिये..
दिल बहलाने की हे-डाह प्रिये..
हे भूख तड़प व प्यास प्रिये...
आ जाओ जीवन आस प्रिये...
मिट जाए सारी प्यास प्रिये...
खिल जाए फिर मधुमास प्रिये...
कितना नीरस मधुमास प्रिये...
हे प्रेम मार्ग की भंवर प्रिये...
चंदन की ठंढ़ सुगंध प्रिये...
चाहत की मुक्तक छंद प्रिये...
सागर की मानस हंस प्रिये...
हिरनी की चाल कुलांच प्रिये...
गुलजार करो मधुमास प्रिये...
पावन कर दो मधुमास प्रिये...
कितना नीरस मधुमास प्रिये...
मिल जाओ मेरी मधुमास प्रिये...
आ जाओ मेरी मधुमास प्रिये...

कोहरे की धुंध में

कोहरे की धुंध में हम तुझे तकते रहे
घोर ठिठुरन गलन में तनहाइयां लिखते रहे
पहले देखा घूरकर फिर पलटकर देखा नहीं
बदनामियां मिलती रहीं हम आस में जीते रहे
ठंड से हम कांपकर तुझपे निछावर हो रहे 
तू अकड़ से जा रही हम तेरी खातिर मर रहे
बस तेरी तस्वीर इस दिल से चिपककर रह गई
तू है कांटों की बनी जो उम्रभर चुभती रहे
मैने तेरे हर कदम पर अपने दामन को रखा
तू कुचल देती रही हम दर्द ही सहते रहे
था नहीं कोई इरादा और आई भी नहीं
हम तेरी यादों के बंगले में अंकेले ही रहे
आंधियां न बिजलियां न बारिशें आई कभी
दिन रात सारी जिंदगी हम रिमझिमों को तक रहे
इश्क के उस दौर में हम फैलकर चैड़े रहे
तुमने कुछ बख्शा नहीं हम दौरे मुंगेरी रहे
हम जिंदगी व जिगर में सिगरेट सुलगाते रहे
चाहा तुझको जिस जिगर में उसको सुलगाते रहे

Wednesday, January 24, 2018

थोड़ा तो शर्म कर




धुंध के साए जब से पड़े शहर में
लोग घबराए पहली दफा अपने घर में
कौन जाने किसकी मौत
कब आ जाये यह हालात है, अब शहर में

बेहया प्रदूषण से सारे विश्व में
आंखें शरमाये अपने शहर के
खंजरो और चाकुओं से भी ज्यादा
जिस्म थर्राया हवा में फेले जहर से...

सांसों में दिक्त और जलन आखों में
लाख जतन कर लो, अब जी नहीं
पाओंगे इस शहर में, अब भी कुछ
उम्मीद है बाकी थोड़ा तो शर्म कर
शहर को बचाने को थोड़ा प्रदूषण कम कर।

मैं मान भी लू!

मैं मान भी लू तुम नहीं हो मेरी
तो भी ना मानेगा यह शहर तेरा
बात हमारी जिन्दगी की है
चाहे कायम न हो अब विश्वास मेरा...

भले ही मैं कोई ना रहू तेरा
लेकिन कुछ तो अधिकार है मेरा
तुम बच भी जाओं इस दुनिया के ताने से
पर कैसे सहोगी तड़प मेरा...

अब मुझे ज़ायका जिन्दगी का देती है
तुम्हारे लब पर मेरे नाम का जो है जहर पड़ा
नज़र अब आती नहीं तुम्हारे होठो की जहर कहीं
बताओंगी जरा ऐसी मायूसी की है वजह क्या?

न मैं बदला, न बदला है घर मेरा
तुम फिर आ जाओं देखों यह
शहर तुम्हारे बिना है कैसे पड़ा।
खोया है जबसे तुमको इस शहर ने
हो गया है शहर उदास बड़ा।