Monday, September 3, 2018

सांस का क्या सांस तो मजबूरन आनी जानी है...



जिंदगी अब बहुत बीरानी है, सांस तो मजबूरन आनी-जानी है...
अगर तब आंस भी गिरते तो वो मोती थे...
अब दरिया भी बहा दूं तो सब पानी है...
मुझे अपना बनाकर, रहबरी का भरम रख देते...
भले तुम उसपे मरते, कहीं मुझको भी रख देते...
मैं भी अपने शबाब पर हूं, मुझमें भी जवानी है...
बताओ अब कहां जाऊं मैं, मुझे कैसे बितानी है... 
चाहकर भी मर नहीं सकती, बस जिंदगी गंवानी है...
तुम अगर भरम भी रख देते, तो बात कुछ और होती...
चीखकर अब दरिया भी बहा दूं, तो सिर्फ पानी है...
जिंदगी अब बहुत बीरानी है, सांस तो मजबूरन आनी-जानी है...
जिन्दगी भर की तपस्या का उदय तुम थे...
मन्नते, भूख प्यास, आश, खुदा तुम थे...
अब कौन समझेगा, तब जमाने से खफा हम थे...
दुश्मनी मां-बाप से करने की वजह तुम थे...
ये तो सच है कि तुम मुझपे तब मरते थे...
पा के मुझे लम्हों में कायनाथ से न डरते थे...
क्या हुआ तुमको की मेरा असर कम होने लगा...
मेरी दुआओं में जहन्नुम का बसर होने लगा...
अब तो इस बसर में जिहालत की रवानी है...
सांस का क्या सांस तो मजबूरन आनी जानी है...

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