Tuesday, September 18, 2018

बचपना तो जिंदा रखो



बचपन के जो ख्वाब थे,
वो अब जा कर बता रहा हूं...
कभी चाहत चांद का था,
कभी ख्वाब आसमान का था...
पर अब जिन्दगी में तू नहीं है,
और ना ही अब तुम्हारी चाहत है...

चुप रहता हूं अब पत्थर सा,
दिल पर यही असर हुआ है...
बचपन के जो ख्वाब थे,
वो अब कही बिखर गये है...
खो गया कही वजूद अपना,
दो जून की रोटी में...
अब आंखे बंद होते ही,
सपने अक्सर मुझसे पुछते है...
कहां है तमन्ना तुम्हारी,
कहां तुम्हारी चाहत है...
दो जून की रोटी बस,
यही तुम्हारी हालत है...
जमानें मे आये हो तो,
जीने का हुनर भी सिखो...
अब चाहत भले ही ना रखो,
आसमान, चांद का...
पर बचपना तो जिंदा रखो।

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