Thursday, November 26, 2015

वक्त हमें कई बार

वक्त हमें कई बार अंधेरे में लाकर छोड़ देती है
दर्द में बेबस बेहाल कर देती है
तब ना मैं नजर आता हूं और ना कोई रास्ता नजर आजा है
दूर-दूर तक बस अंधेरा नजर आता है...

इस अंधेरे में तड़पता हूं, रोता हूं
चिख्ता हूं चिल्लाता हूं, गिड़गिड़ाता हूं
फिर लाचार सा गिर जाता हूं...

सोचता हूं कोई तो आएगा मरहम लगाने को
पर इस शहर में बिना मरहम दिल तोड देती है
वक्त कई बार यू ही अंधेरे में ला कर छोड़ देती है...

कई अपने पराए की समझ तब आती है
सोचता हूं इस शहर में क्या पाया मैंने
फरेब, धोखा, जालसाजी के अलावे...

रोज भीड़-भाड़ में चश्मा पोछ-पोछ कर देखता हूं
इस शहर में चौक-चौराहे पर अपने जैसा खोजता हूं
मुझे पता है मैं उसे नहीं डूंड पाउंगा फिर भी
बेबस सा उसके पीछे भागता हूं...

वक्त हमें कई बार अंधेरे में लाकर छोड़ देती है
जिंदगी यू ही कहीं रेत की तरह फिसल जाती है...

Friday, November 20, 2015

वक्त कितना कुछ सिखा देता है

वक्त कितना कुछ सिखा देता है
एक मासूम को जवां बना देता है
खेलना कुदना छोड़ कर कामों में फसा देता है
वक्त कितना कुछ सिखा देता है...

जिंदगी को नया बना देता है
दुनिया की हकीकत से रू-ब-रू करा देता है
सब कुछ झोड़ किसी और में रमा देता है
वक्त हमें कितना कुछ सिखा देता है...

अजीब कश्मकस है जिंदगी में यारो
कुछ पाने की चाह में जिंदगी बिता देते है
वक्त एक पल में उसे मीटा देता है
इस वक्त के आगे सब लाचार है...

दुनिया में सब इसके आगे बेकार है
अब सोचता हूं क्या मिला जिंदगी में
धोखा-ठोकर के अलावे, शायद यही वक्त
की मार है इसके आगे सब लाचार है
वक्त कितना कुछ सिखा देता है...


Tuesday, November 17, 2015

कुछ सपने है जिनकी दास्ता अभी अधूरी है

कुछ सपने है, जिनकी दास्ता अभी अधूरी है
मंजिलों से बस कुछ कदमों की दूरी है
कमद तो थकते नहीं पर फासला बढ़ गए है
वक्त की मिट्टी तले हौसले गढ़ रहे है

छोटे से ही थे पर अब दिनों-दिन और भी सिकुड रहे है
जिन सपनों को लेकर उड़ना चाहते थे, आज वह फुदक रहे है
कुछ सपने है जिनकी दास्ता अभी अधूरी है
मंजिलों से बस कुछ कदमों की दूरी है

उन कदमों को नापने रोज घर से निकल जाता हूं
शाम को फिर खाली हाथ घर को वापस आता हूं
सपनों को पाने की चाह में फिर खो जाता हूं
सुबह फिर नई ताजगी के साथ सपनों के पिछे लग जाता हूं

लेकिन अब लगने लगा है
सपने मेरे कहीं बिखरने लगे है
जैसे-जैसे समय़ बीतता जा रहा है
मेरे सपने खुद ही सिकुडते जा रहा है

मेरे अंदर एक चुभन सी होने लगी है
सपने बिखर कर कहीं खोने लगी है
लेकिन मुझे उन सपनों को पाना है
जिनकी दास्ता अभी लिखे जानी है