Tuesday, November 17, 2015

कुछ सपने है जिनकी दास्ता अभी अधूरी है

कुछ सपने है, जिनकी दास्ता अभी अधूरी है
मंजिलों से बस कुछ कदमों की दूरी है
कमद तो थकते नहीं पर फासला बढ़ गए है
वक्त की मिट्टी तले हौसले गढ़ रहे है

छोटे से ही थे पर अब दिनों-दिन और भी सिकुड रहे है
जिन सपनों को लेकर उड़ना चाहते थे, आज वह फुदक रहे है
कुछ सपने है जिनकी दास्ता अभी अधूरी है
मंजिलों से बस कुछ कदमों की दूरी है

उन कदमों को नापने रोज घर से निकल जाता हूं
शाम को फिर खाली हाथ घर को वापस आता हूं
सपनों को पाने की चाह में फिर खो जाता हूं
सुबह फिर नई ताजगी के साथ सपनों के पिछे लग जाता हूं

लेकिन अब लगने लगा है
सपने मेरे कहीं बिखरने लगे है
जैसे-जैसे समय़ बीतता जा रहा है
मेरे सपने खुद ही सिकुडते जा रहा है

मेरे अंदर एक चुभन सी होने लगी है
सपने बिखर कर कहीं खोने लगी है
लेकिन मुझे उन सपनों को पाना है
जिनकी दास्ता अभी लिखे जानी है

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