Monday, February 8, 2016

फूल हरेक रिश्तों का मैं तोड़ आया हूं

उसके सवालों और जज्बातों से अब आगे निकल आया हूं...
कमजोरी ए लगाव से अब खुद को निकल लाया हूं...
स्कूल कॉलेज, गली का चक्कर लगाना अब सब पिछे छूट गए...
तकराक और नोक-झोक सब हम से कही रूठ गए...
उस दुनिया से तो कही दूर भटक आया हूं...
इस दुनिया में अपनों को छोड़ किसी और के साथ चल आया हूं
बीच मझधार खड़ा हुं, है भंवर आहों का
फूल हरेक रिश्तों का आज मैं तोड़ आया हूं...

तुम आओंगी

दूर होकर भी तुम पास थी...
ऐसे ही कुछ एहसास थी..
पर अब वह एहसास टूटने लगा है..
तुम पास रह कर भी मन कहीं और भटकने लगा है...

इसमें खता तेरी है या मेरी है...
या वक्त के आगे हम दोनों की लाचारी है...
हम अपने तरफ से पहल करते रहे...
पर वक्त हम दोनों से यू ही आंख मिचोली खेलते रहे...

अब मेंरे दिल में जख्में नासूर बन कर उभरने लगे हैं...
दर्द यहां वहां ना जाने कहां-कहां यू ही बिखरने लगे हैं...
मैं नहीं जानता क्यों तुम दूर जा रही हो...
कुछ तो है जो हम दोनों को यू ही भटका रही है...

मैं अब इस भटकन से तड़पने लगा हूं...
तुम्हें पाने का रोज-रोज नया नया तरीका
खोजने लगा हूं मुझे विश्वास है तुम एक
दिन वापस आओंगी और डुबती कश्ती को पार लागाओंगी...