Tuesday, May 23, 2017

कभी धूप तो कभी छाव है जिन्दगी

खुशियों की ख्वाब से बनती है जिन्दगी।
सपनो की कलम से लिखती है जिन्दगी।
अपनों के प्यार से महकती है जिन्दगी।
हर पल एक नया किस्सा सुनाती है जिन्दगी।

कभी गम, तो कभी खुशी है जिन्दगी।
कभी धूप, कभी छाव है जिन्दगी।
बनते बिगड़ते हालातों का हिसाब है जिंदगी।
हर रोज जिसमें एक नया पन्ना जुड़े वह किताब है जिन्दगी।

भगवान ने जो दिया वो उपहार है जिन्दगी।
कभी सपनो की भीड़, तो कभी भीड़ में तन्हा है जन्दगी।
कुदरत ने जो धरती पर बिखेरा वो प्यार है ज़िन्दगी।
बारिश में भिंगी गिली मिट्टी की सोंधी खूशबू है जिन्दगी।

कभी प्यार तो, कभी गम की परछाई है जिन्दगी।
अपने-पराये की रहनुमाई है जिन्दगी।
जिसने इसको जैसे ढाला वैसे वन गई उसकी जिन्दगी।

Monday, May 22, 2017

बारिश होगी


काला घोर बादल आया है
संग अपने बरखा लाया है
सारी धरती चहक उठी है
पर तुम नहीं आई
मैं चुपचाप देखता रहा बारिश की
गीरती बूंदों को, बूंदों की सरगोशी को

उससे उठती संगीत को, मैं अकेला
सूनता रहा, तुम नहीं थी मैं तनहा
तुम्हें खोजता रहा।
मिट्टी की सोंधी खुशबू महक रही है।
उस खुशबू में तुम्हें महसूस कर पा रहा हूं।

हर दफा यही होता है जब-जब बारिश होती है
मैं अकेला होता हूं उसकी गिरती बूंदों से लेकर मिट्टी
की उड़ती सोंधी खुशबू को मैं अकेले महसूस करता हूं।

तुम एक बार भी साथ नहीं रही हो, पूरे बरसात में
सरक जाता है बादल चांद अचानक मुस्काता है।
उस पल हमदम तेरा चेहरा बादलो के बीच
उस चांद में नजर आता है।

पर तुम नहीं होती हो पूरे बरसात में
मैं अकेला भिंगता हूं तुम्हें खोजता हूं
तुम्हारे चेहरे को बादलों के बीच उस चांद में देखता हूं।
तुम नहीं मिलोगी यह मैं जानता हूं।

इस बार बारिश आयेंगी मैं अकेले भींगूगा
तुम्हें भूल कर खुद में खो जाऊंगा।
मिट्टी की सोंधी खुशबू में, तुम्हें नहीं खुद को पाऊंगा।