वक्त के साथ-साथ इनसान बदल रहे है...
रिश्तों के गहराई में इमान बदल रहे है...
जिस रिश्ते को लेकर इनसान जिंदगी भर चलता था...
आज उन्ही रिश्तों के मुकाम बदल रहे...
सोचता हूं इस बदलाव में अपने को कहां तक डाल पाउंगा...
या यू ही जिंदगी के रिश्तों में उलझ कर रह जाऊंगा...
इस रिश्ते की कश्मकस को रोज समझना चाहता हूं...
वक्त और हालात के साथ खुद से समझौता कर रहा हूं
जिंदगी को फिर से नया बना रहा हूं...
रोज जीने का नया ढंग अपने को सिखा रहा हूं...
शायद इस दौर की यही परिभाषा है...
रिश्तों को निभाने के लिए करना अपने से कई समझौता है......