Tuesday, July 18, 2017

तुम फिर चली आओं

तुम फिर चली आओं
इतनी गाड़ियां चलती है
कहीं से भी आ सकती हो मेरे पास
कुछ दिन रहना मेरे साथ मेरे घर में
वह उतना ही तुम्हारा है जितना मेरा
तुम्हें निहारने की तड़प उठी है
तुम्हें सुनने की ललक जगी है।

तुम चली आओं कुछ दिन रहना मेरे साथ
जैसे तुम कभी गई ही नहीं कहीं
मेरे पास वक्त घटते जा रहे है
मेरी प्यारी दोस्त तुम आओं
तुम्हें देखने की तड़प लगी है।

घनी आबादी वाले दिल्ली में
कितनी लड़कियां लौटती है, शाम होते ही
अपने-अपने घर, मैं रोज उन मेट्रो में खोजता हूं
कई बार सचमुच लगता है, तुम आ रही हो
वहीं लंबे-लंबे बाल, झील सी आंखे, आंखों में किताबों की आग
वहीं दुबला-पतला शरीर, सफेद सूट पर पीली चुन्नी
कंधे पर झुलती गांधी झोला और पैरो में हवाई चप्पल।

तुम चली आओं, मुझसे मिलने
सबकुछ मृत्य है यहां पर
मुलाकाते कभी मृत्य नहीं होती
इनकी ताजगी बनी रहती है
हवाओं में तुम चली आओं तुम्हें देखने की
आस लिए बैठा हूं, तुम्हारे इंतजार में।