Sunday, February 26, 2017

मैं तुम्हें फिर मिलूंगा

मैं तुम्हें फिर मिलूंगा
कब, कहां, कैसे मुझे नहीं पता...
पर मैं तुम्हें मिलूंगा शायद तुम्हारी यादों में
तुम्हारी सांसों में या फिर
तुम्हारे लहु के हर करते में...

मैं तुम्हे मिलूंगा तुम्हारे हर रंजो-गम
तुम्हारी खूशियों में तुम्हारे गम में
तुम्हारे लहु में एक कतरा भी तो ऐसा नहीं
जिसमें मैं नहीं हर जगह मैं मिलूंगा...

मैं मिलूंगा तुम्हारे हर एक धड़कन में
हवा के जोके में बारिश के बुंदों में
धरती से लेकर गगन में.....
मैं मिलुगा शायद तुम्हें अगले जन्म में...

Friday, February 24, 2017

बस पापा के कंधे और मम्मी की गोद



जब दुनिया में कठिन रास्ता न था,
तब संसार से कोई वास्ता न था...
अनजान-अनवरत जब यह मन था,
कितना अनमोल वह बचपन था।

वो दुनिया कितनी हसीन थी,
वह समय कतिने मासूम थे
वो ख्वाबों की जमीन,
वो सपनों का आसमां ...
वो बचपन कितना नादान
वो दुनिया कितनी रंगीन...

जब आगे निकल जाने की होड़ न थी
जब दुनिया की ये पागल दौड़ न थी....
जब पल में रूठना और पल में मनाना था,
जब दोस्ती का खुबसूरत वो जमाना था।

जब तोड़ते तोड़ते चुरा कर पेड़ों से
बेर, अमरुद और आम थे।
जब रखते एक दूसरे के कैसे-कैसे नाम थे।

जब धूप, बारिश, आंधी सब झेला करते थे
जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे।
ना पैसे की चिंता न फियूचर की सोच
बस पापा के कंधे और मम्मी की गोद