Saturday, November 25, 2017

क्योंकि हम बेटे भी घर छोड़ जाते है!

जो कभी अंधेरे से लड़ते थे
वह आज उजाले से डरने लगे है।
जो हमेशा अपने बहनों से लड़ते थे
वह आज चुप रहने लगे हैं।
खाने में भाई-बहन से लड़ने वाले
आज कुछ भी खा लेते है।
क्योंकि हम लड़के भी घर छोड़ जाते है।

अपने बिस्तर पर किसी को बैठने नहीं देने वाले
आज सबके साथ सो जाते हैं।
हजारों ख्वाहिशें रखने वाले
अब समझौता कर जाते है।
पैसा कमाने की चाहत में
अपनो से अजनबी हो जाते है।
क्योंकि हम बेटे भी घर छोड़ जाते है।


मम्मी के हाथों से खाने वाले
आज खुद जले पके बना कर खाते है।
माँ बहन के हाथों का खाना
अब वह कहाँ खा पाते है।
हम लड़के भी घर छोड़ जाते है।

गाँव की सड़कें, वह हरे भरे खेत
दोस्त यार, माँ बाप, भाई बहन का प्यार
सब कभी पीछे छूट जाते है।
भाई साहब क्योंकि हम लड़के भी घर छोड़ जाते है।

अक्सर तन्हाई में सबको कर के याद
वह भी आंसू बहाते है।
जिम्मेदारी की बोझ सबसे जुदा कर जाती है।
मत पूछो इनका दर्द वह कैसे जी पाते है।
क्योंकि लड़के भी घर छोड़ जाते है।

कभी ऐसा भी होता!

कभी ऐसा भी होता
हम तुम बाते करते-करते
बहुत दूर निकल जाते।
तुम होती अपनी पुराने लिबास में
मैं होता अपने अंदाज में...

तुम मेरे हाथ थामे होती
आते जाते सब की निगाहें
हम पर अटक जाती
कितना अच्छा होता
मैं होता, तुम होती
और यह रास्ता
थोड़ा लम्बा होता...

हम चलते जाते
आखों में आँखे डाल कर
अपने घरौंदे की ओर
जहाँ तुम रहती, मैं रहता
और हमरा आने वाला कल रहता...

जहां न अपनों की निगाहें होती
न दुनिया की परछाई
बस तुम होती, मैं होता
और हमारा सुनहरा पल होता
काश कभी ऐसा भी होता।।

 

Tuesday, August 1, 2017

फर्क यही है


फर्क यही तुम्हारे और मेरे लेखन में है
तुम जादूगर शब्दों की हो
मैं लिखता जज्बात हूं।
तुम शब्दों को मोड देती हो
मैं जज्बातों को खोल देता हूं।

तुम देखती हो हसीन सपने
मैं अपने पुराने दबे ज़ख्म देखता हूं
तुम जब भी दिखाती हो कोई रंगीन ख्वाब
मैं अक्सर अपने नींद से जग जाता हूं।

तुमने सीखा हसीन ख़्वाब को जीना
मैंने सीखा जिन्दगी को गले लगाना
तुमने पढ़ा किताबों के पन्ने
मैंने तर्जुबे से सबक लिया।

फर्क यही है तुम्हारे और मेरे लेखन में
तुमने लिखे मोहब्बत के नगमें
मैं लिखता जीवन का कश्मकस हूं।
तुम करती जिसका आगाज हो
मैं उस सफऱ का अंजाम हूं।

तुम बिखेरती फरेबी मुस्कान हो
मैंने तो ताउम्र दर्द को पाला है
तुम गिनती लहरों को हो
मैंने लहरों को गले लगाया है।

फर्क यही है तुम्हारे और मेरे लेखन में
तुम जादूगर शब्दों की हो
मैं लिखता जज्बात को।

Tuesday, July 18, 2017

तुम फिर चली आओं

तुम फिर चली आओं
इतनी गाड़ियां चलती है
कहीं से भी आ सकती हो मेरे पास
कुछ दिन रहना मेरे साथ मेरे घर में
वह उतना ही तुम्हारा है जितना मेरा
तुम्हें निहारने की तड़प उठी है
तुम्हें सुनने की ललक जगी है।

तुम चली आओं कुछ दिन रहना मेरे साथ
जैसे तुम कभी गई ही नहीं कहीं
मेरे पास वक्त घटते जा रहे है
मेरी प्यारी दोस्त तुम आओं
तुम्हें देखने की तड़प लगी है।

घनी आबादी वाले दिल्ली में
कितनी लड़कियां लौटती है, शाम होते ही
अपने-अपने घर, मैं रोज उन मेट्रो में खोजता हूं
कई बार सचमुच लगता है, तुम आ रही हो
वहीं लंबे-लंबे बाल, झील सी आंखे, आंखों में किताबों की आग
वहीं दुबला-पतला शरीर, सफेद सूट पर पीली चुन्नी
कंधे पर झुलती गांधी झोला और पैरो में हवाई चप्पल।

तुम चली आओं, मुझसे मिलने
सबकुछ मृत्य है यहां पर
मुलाकाते कभी मृत्य नहीं होती
इनकी ताजगी बनी रहती है
हवाओं में तुम चली आओं तुम्हें देखने की
आस लिए बैठा हूं, तुम्हारे इंतजार में।

Wednesday, June 7, 2017

सुख और दुःख केगीत



सुने है मैंने बहुत सुख और दुःख के गीत
चलो आज मिलकर सुनते है खामोशी भरी संगीत
जिसमें न है कोई सूर और न ही कोई गीत
फिर भी वह है अपने दिल के बहुत करीब।

सुने हैं मैने बहुत सुख और दुःख के गीत
महसूस की है मैंने वह रागनी की संगीत
जिसमें तुम हुआ करती थी कभी मेरे करीब
सूना है मैंने वह खूशियों भरी गीत।

महसूस की है मैंने वह सूख और दुःख की संगीत
जहां बजती है कभी दिल की गीत
तो कभी होती है खामोशियों हमारी मीत
तब सैलाब सा होता है मन के अंदर
सामने बिखर आते है आंसू के समंदर
तब जीत कर भी ज़िन्दग़ी में मिलती नहीं जीत।
मैंने सुने है बहुत सुख और दुःख के गीत।

Tuesday, May 23, 2017

कभी धूप तो कभी छाव है जिन्दगी

खुशियों की ख्वाब से बनती है जिन्दगी।
सपनो की कलम से लिखती है जिन्दगी।
अपनों के प्यार से महकती है जिन्दगी।
हर पल एक नया किस्सा सुनाती है जिन्दगी।

कभी गम, तो कभी खुशी है जिन्दगी।
कभी धूप, कभी छाव है जिन्दगी।
बनते बिगड़ते हालातों का हिसाब है जिंदगी।
हर रोज जिसमें एक नया पन्ना जुड़े वह किताब है जिन्दगी।

भगवान ने जो दिया वो उपहार है जिन्दगी।
कभी सपनो की भीड़, तो कभी भीड़ में तन्हा है जन्दगी।
कुदरत ने जो धरती पर बिखेरा वो प्यार है ज़िन्दगी।
बारिश में भिंगी गिली मिट्टी की सोंधी खूशबू है जिन्दगी।

कभी प्यार तो, कभी गम की परछाई है जिन्दगी।
अपने-पराये की रहनुमाई है जिन्दगी।
जिसने इसको जैसे ढाला वैसे वन गई उसकी जिन्दगी।

Monday, May 22, 2017

बारिश होगी


काला घोर बादल आया है
संग अपने बरखा लाया है
सारी धरती चहक उठी है
पर तुम नहीं आई
मैं चुपचाप देखता रहा बारिश की
गीरती बूंदों को, बूंदों की सरगोशी को

उससे उठती संगीत को, मैं अकेला
सूनता रहा, तुम नहीं थी मैं तनहा
तुम्हें खोजता रहा।
मिट्टी की सोंधी खुशबू महक रही है।
उस खुशबू में तुम्हें महसूस कर पा रहा हूं।

हर दफा यही होता है जब-जब बारिश होती है
मैं अकेला होता हूं उसकी गिरती बूंदों से लेकर मिट्टी
की उड़ती सोंधी खुशबू को मैं अकेले महसूस करता हूं।

तुम एक बार भी साथ नहीं रही हो, पूरे बरसात में
सरक जाता है बादल चांद अचानक मुस्काता है।
उस पल हमदम तेरा चेहरा बादलो के बीच
उस चांद में नजर आता है।

पर तुम नहीं होती हो पूरे बरसात में
मैं अकेला भिंगता हूं तुम्हें खोजता हूं
तुम्हारे चेहरे को बादलों के बीच उस चांद में देखता हूं।
तुम नहीं मिलोगी यह मैं जानता हूं।

इस बार बारिश आयेंगी मैं अकेले भींगूगा
तुम्हें भूल कर खुद में खो जाऊंगा।
मिट्टी की सोंधी खुशबू में, तुम्हें नहीं खुद को पाऊंगा।




Tuesday, April 25, 2017

तुम खुश तो होगे

तुम खुश तो होगे...
तुम्हारी रोटियां पक तो जाएंगी
सेना की चिताओं की गर्मी से
तुम खुश तो हुए होंगे।

उनके बिखरे परिवार को रोते देख कर
वह रोते रहे हैं और रोते रहेंगे
तुम्हारे चेहरे का बिम्ब खिला तो होगा
शायद गिद्ध की भांति जो मुर्दो को खाकर
अपना पेट भरता है।
 
शायद तुम भी वही गिद्ध हो
जो जा रहे सेनाओं पर टूट पड़े
तुम्हारे खोखले विचारधारा का सार
बंदूक की नली है जो बेसहारों से लेकर
देश की रक्षा में लगे जवान तक को खा जाती है।

तुम खुश तो होंगे उनके परिवार के विलाप पर
यह देश उस सेना की मां बहुत कुछ झेल सकती है
क्योंकि वह बर्दाश्त करती है यहां के आंतरिक आतंकवाद को 

Monday, April 10, 2017

अपने दिल की हाल बताना मुश्किल है

इश्क का इरादा बदल जाना मुश्किल है
तुम्हें पाना भी मुश्किल है तुम्हें खोना भी मुश्किल
जरा-जरा यादों पर आंखें भिगो कर बैठ जाता हूं
तुम्हें तो अपने दिल की हाल बताना भी मुश्किल है..

जानता हूं तुम्हारी आंखों की प्यास गहरी है
पर मेरे आंखों की नदी भी कभी कहां सुखते
तुम पत्थर हो पत्थर की आंख कहां पिघलती
पथराये शरीर के भीतर आंसू कहां पनपते....

जमीन और आसमां नहीं मिलते कभी
बस मिलते हुए प्रतित होते है....
तुम्हे पाने की भगवान से कभी प्रार्थना नहीं की
और क्यूं करु तुम तो खुबशूरत गुलाब हो
जिसकी सुन्दर पंखुड़ियां कल कहीं जमी
पर बिखरी होंगी जो खुद एक दार्शिन होगा
मैं उसे क्यों मांगू जिसको सब चाहते है।

Saturday, March 11, 2017

मेरे रास्तों में तेरा घर है की नहीं

मेरे घर को ख्वाबों से सजाने वाली
तेरे ख्वाबों के घर में मेरी जगह है की नहीं...
अपनी जहन से पूछ कर बता देना मुझको
मेरे रास्तों की मुकद्दर में तेरा घर है की नहीं....

तन की सरहदों के दायरे में एक ख्वाब बसाया है
दिल के झरोखे में तुझको बिठाया है.....
तू बता दे मेरे रास्तों में तेरा घर है की नहीं
बस तू बता दे करवट बदल लूगां तेरी राहों से
कहीं और निकल लूंगा...

उसे उदास ख़्वाब-सा दरकिनार कर दूंगा..
उसके बाद हकीकत सा निखर जाऊंगा...
प्यार पर बस तो नहीं है मेरा, लेकिन फिर भी
तू बता दे की तुझे प्यार करू या नहीं....

Sunday, February 26, 2017

मैं तुम्हें फिर मिलूंगा

मैं तुम्हें फिर मिलूंगा
कब, कहां, कैसे मुझे नहीं पता...
पर मैं तुम्हें मिलूंगा शायद तुम्हारी यादों में
तुम्हारी सांसों में या फिर
तुम्हारे लहु के हर करते में...

मैं तुम्हे मिलूंगा तुम्हारे हर रंजो-गम
तुम्हारी खूशियों में तुम्हारे गम में
तुम्हारे लहु में एक कतरा भी तो ऐसा नहीं
जिसमें मैं नहीं हर जगह मैं मिलूंगा...

मैं मिलूंगा तुम्हारे हर एक धड़कन में
हवा के जोके में बारिश के बुंदों में
धरती से लेकर गगन में.....
मैं मिलुगा शायद तुम्हें अगले जन्म में...

Friday, February 24, 2017

बस पापा के कंधे और मम्मी की गोद



जब दुनिया में कठिन रास्ता न था,
तब संसार से कोई वास्ता न था...
अनजान-अनवरत जब यह मन था,
कितना अनमोल वह बचपन था।

वो दुनिया कितनी हसीन थी,
वह समय कतिने मासूम थे
वो ख्वाबों की जमीन,
वो सपनों का आसमां ...
वो बचपन कितना नादान
वो दुनिया कितनी रंगीन...

जब आगे निकल जाने की होड़ न थी
जब दुनिया की ये पागल दौड़ न थी....
जब पल में रूठना और पल में मनाना था,
जब दोस्ती का खुबसूरत वो जमाना था।

जब तोड़ते तोड़ते चुरा कर पेड़ों से
बेर, अमरुद और आम थे।
जब रखते एक दूसरे के कैसे-कैसे नाम थे।

जब धूप, बारिश, आंधी सब झेला करते थे
जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे।
ना पैसे की चिंता न फियूचर की सोच
बस पापा के कंधे और मम्मी की गोद