Wednesday, January 24, 2018

थोड़ा तो शर्म कर




धुंध के साए जब से पड़े शहर में
लोग घबराए पहली दफा अपने घर में
कौन जाने किसकी मौत
कब आ जाये यह हालात है, अब शहर में

बेहया प्रदूषण से सारे विश्व में
आंखें शरमाये अपने शहर के
खंजरो और चाकुओं से भी ज्यादा
जिस्म थर्राया हवा में फेले जहर से...

सांसों में दिक्त और जलन आखों में
लाख जतन कर लो, अब जी नहीं
पाओंगे इस शहर में, अब भी कुछ
उम्मीद है बाकी थोड़ा तो शर्म कर
शहर को बचाने को थोड़ा प्रदूषण कम कर।

मैं मान भी लू!

मैं मान भी लू तुम नहीं हो मेरी
तो भी ना मानेगा यह शहर तेरा
बात हमारी जिन्दगी की है
चाहे कायम न हो अब विश्वास मेरा...

भले ही मैं कोई ना रहू तेरा
लेकिन कुछ तो अधिकार है मेरा
तुम बच भी जाओं इस दुनिया के ताने से
पर कैसे सहोगी तड़प मेरा...

अब मुझे ज़ायका जिन्दगी का देती है
तुम्हारे लब पर मेरे नाम का जो है जहर पड़ा
नज़र अब आती नहीं तुम्हारे होठो की जहर कहीं
बताओंगी जरा ऐसी मायूसी की है वजह क्या?

न मैं बदला, न बदला है घर मेरा
तुम फिर आ जाओं देखों यह
शहर तुम्हारे बिना है कैसे पड़ा।
खोया है जबसे तुमको इस शहर ने
हो गया है शहर उदास बड़ा।