जब दुनिया में कठिन रास्ता न था,
तब संसार से कोई वास्ता न था...
अनजान-अनवरत जब यह मन था,
कितना अनमोल वह बचपन था।
वो दुनिया कितनी हसीन थी,
वह समय कतिने मासूम थे
वो ख्वाबों की जमीन,
वो सपनों का आसमां ...
वो बचपन कितना नादान
वो दुनिया कितनी रंगीन...
जब आगे निकल जाने की होड़ न थी
जब दुनिया की ये पागल दौड़ न थी....
जब पल में रूठना और पल में मनाना था,
जब दोस्ती का खुबसूरत वो जमाना था।
जब तोड़ते तोड़ते चुरा कर पेड़ों से
बेर, अमरुद और आम थे।
जब रखते एक दूसरे के कैसे-कैसे नाम थे।
जब धूप, बारिश, आंधी सब झेला करते थे
जब सुबह से शाम तक बस खेला करते थे।
ना पैसे की चिंता न फियूचर की सोच
बस पापा के कंधे और मम्मी की गोद
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