Monday, February 8, 2016

फूल हरेक रिश्तों का मैं तोड़ आया हूं

उसके सवालों और जज्बातों से अब आगे निकल आया हूं...
कमजोरी ए लगाव से अब खुद को निकल लाया हूं...
स्कूल कॉलेज, गली का चक्कर लगाना अब सब पिछे छूट गए...
तकराक और नोक-झोक सब हम से कही रूठ गए...
उस दुनिया से तो कही दूर भटक आया हूं...
इस दुनिया में अपनों को छोड़ किसी और के साथ चल आया हूं
बीच मझधार खड़ा हुं, है भंवर आहों का
फूल हरेक रिश्तों का आज मैं तोड़ आया हूं...

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