हम भी अपने गांव में हुआ करते थे बहुत बदमास
चोरी कर के खाया करते थे खट्टे मीठे आम..
गांव की गलीयों के हम होते थे सरदार...
बरगद के पेढ़ पर बैठ कर कतरे थे यारो से मुलाकात..
जिंदगी के सफर में ये सारी चीजे कहीं छुटती गई
वक्त हमसे कहीं आगे निकलती गई...
उस वक्त में फिर से जाने को जी चाहता है..
जिंदगी के उस पल को पाने को जी चाहता है..
जिंदगी में बहुत कुछ करने की चाह हमें कहां ले जाती है..
आगे और पिछे का बहुत कुछ हमसे छीन जाती है...
वक्त के साथ-साथ हम निकलते चले जाते है...
बहुत कुछ पाने के बाद भी तन्हाई में खुद को अकेले ही पाते है...
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