क्या लिख्खूं मैं टूटे दिल पर ये कलम न लिखने देती है
होंठ सिला सा जाता है, कुछ जीभ न कहने देती है
इस घायल कातर प्रेमी का, सब हाल सूंघने निकले हैं
इस सिया हरण के राघव का, सब मजा लूटने निकले हैं
जिनकी ओंछी औकात, नग्न मुख जीभ नपुंशक जारी है
जिनका शब्द समूह स्वयं, गाली सम अत्याचारी है
उनके निकृष्ट छल छंदों का पूरा समाज आभारी है
उनका लहजा रावण सा है, व हरकत शूर्पणखा सी है
उनके भी पिता दुष्यंता हैं, व माता मीरा जी सी हैं
दुर्दांत दस्युता का पालक, पोषक ढ़ोंगी पाखण्डों का
महिमामंडन निज खूबी का, बस तंज प्रेम संबंधों का
मन दर्पण मेरा कहता है, था उत्सव यह बस मक्कारों का
हर लहजा मेरा कहता है, है बदला यह उन प्रतिकारों का
भीतर की तड़पन में हम, आग नहीं सुलगाते हैं
जिस्म हलाली की जिद में, आबरू नहीं बिकवाते हैं
दो दिन का यह जीवन है, हर क्षण अर्जन कर जीतें हैं
चंद घड़ी यह चढ़ा जोश, मदहोश न होकर जीते हैं
अस्मत नीलाम करा बैठे, आखिर तुम क्या जानोगे
समय बहुत है, लगता है, घर जानोगे तब मानोगे
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